Bijalii Bachaanii hai to Power factor samajhanaa hogaa

Bijalii Bachaanii hai to Power factor samajhanaa hogaa

जब भी हम बिजली का नाम सुनते हैं तो दिमाग में बल्ब, मोटर या मशीन का ख्याल आता है। लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि जो बिजली हम इस्तेमाल करते हैं, उसमें से कितना हिस्सा सच में काम आता है और कितना हिस्सा यूँ ही बेकार चला जाता है?
यही सच्चाई हमें बताता है Power Factor।

मान लीजिए आपके पास 1 लीटर दूध है। उसमें अगर 200 ml पानी मिला दिया जाए तो अब कुल 1 लीटर तो है, लेकिन असली दूध सिर्फ 800 ml ही है।
👉 इसी तरह बिजली में भी कुछ हिस्सा काम का (Real Power) होता है और कुछ हिस्सा सिर्फ सिस्टम को चलाने के लिए खर्च होता है, जिसे हम Reactive Power कहते हैं।
दोनो को मिलाकर जो कुल बिजली खींची जाती है, वह होती है Apparent Power।

तो पावर फैक्टर = असली काम की बिजली ÷ कुल खींची गई बिजली

ज़्यादातर इंडस्ट्री में मोटर, ट्रांसफॉर्मर, वेल्डिंग मशीन, पंखे वगैरह चलते हैं। ये सभी Inductive Load होते हैं।
इनमें करंट, वोल्टेज से पीछे रह जाता है और यहीं से Power Factor गिरना शुरू हो जाता है।

• ज़्यादा करंट बहेगा → तार मोटे लगाने पड़ेंगे
• ट्रांसफॉर्मर और जनरेटर पर ज्यादा दबाव
• बिजली का बिल बढ़ेगा
• कंपनी को पेनल्टी भी लग सकती है (कई जगह DISCOM कम PF पर Fine लगाते हैं)

• बिल कम आएगा
• मशीनें आराम से चलेंगी
• Distribution System पर लोड घटेगा
• इंडस्ट्री की Productivity बढ़ेगी

1. Capacitor Bank लगाइए – यह सबसे आसान और सस्ता तरीका है।
2. APFC Panel – बड़े उद्योगों में Load के हिसाब से Capacitor अपने-आप ON/OFF हो जाता है।
3. Synchronous Condenser – यह Reactive Power Control करता है, लेकिन महंगा होता है।

मान लीजिए आपकी मोटर 100 kVA बिजली खींच रही है, लेकिन असल काम सिर्फ 80 kW का हो रहा है।
तो Power Factor = 80 ÷ 100 = 0.8
यानी 20% बिजली यूँ ही बर्बाद हो रही है।

पावर फैक्टर को हमेशा अच्छा (0.95 से ऊपर) रखना बहुत ज़रूरी है।
इसे आप दूध में मिलावट निकालने की तरह समझिए – ज्यादा मिलावट होगी तो नुकसान ही होगा।


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